Saturday, March 28, 2020
विभिन्न देशों में कोरोनवायरस के प्रकोप की तुलना भ्रामक क्यों हो सकती है - और खतरनाक भी
Friday, March 27, 2020
बीडीओ व थानाध्यक्ष ने जानलेवा वायरस से भयभीत लोगों के बीच सहयोग और जागरुकता की मचाई धमाल
बाहरी आगन्तुकों के क्षेत्रों में प्रवेश पर चिकित्सीय जाँच करा उनके भोजन की व्यवस्था का निर्णय
Thursday, March 26, 2020
गिरिडीह उपायुक्त ने विषाणु संक्रमण को ले सहायता प्राप्त करने हेतु जिले भर के नम्बर किए जारी
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Tuesday, March 24, 2020
सीमेंट लदे ट्रक को पुलिस ने लॉक डाउन के दौरान पकड़ा,चालक को किया गिरफतार
Monday, March 23, 2020
आज तक के पत्रकार की कार्यालय जाने के क्रम में देश की राजधानी में पुलिसकर्मी द्वारा बेरहमी से पिटाई का एबीपीएस एस ने किया प्रतिकार
प्यारे साथियों,
इस तरह से यह पत्र लिखना बहुत अजीब सा लग रहा है। लेकिन लगता है कि इस तरह से शायद मेरा दुख, मेरा क्षोभ और वह अपमान जिसकी आग मुझे ख़ाक कर देना चाहती है उससे कुछ हद तक राहत मिल जाए। एक बार को लगा न बताऊं। यह कहना कि पुलिस ने आपको सड़क पर पीटा है कितना बुरा एहसास है। लेकिन इसे बताना जरूरी भी लगता है ताकि आप समझ सकें कि आपके साथ क्या कुछ घट सकता है। वह भी देश की राजधानी में।
कोरोना से लड़ाई में मेरे सैकड़ों पत्रकार साथी बिना किसी बहाने के भरसक काम पर जुटे हुए हैं। मैं भी इसमें शामिल हूं। आज दोपहर डेढ़ बजे की बात है। मैं वसंतकुंज से नोएडा फिल्म सिटी अपने दफ्तर के लिए निकला था। सफदरजंग इन्क्लेव से होते हुए ग्रीन पार्क की तरफ मुड़ना था। वहीं पर एक तिराहा है जहां से एक रास्ता एम्स ट्रॉमा सेंटर की तरफ जाता है। भारी बैरिकेडिंग थी। पुलिस जांच कर रही थी। भारी जाम लगा हुआ था। मेरी बारी आने पर एक पुलिसवाला मेरी कार के पास आता है। मैंने नाम देखा ग्यारसी लाल यादव। दिल्ली पुलिस। मैंने अपना कार्ड दिखाया और कहा कि मैं पत्रकार हूं और दफ्तर जा रहा हूं। मेरी भी ड्यूटी है। उसने सबसे पहले मेरी कार से चाबी निकाल ली। और आई कार्ड लेकर आगे बढ़ गया। आगे का संवाद शब्दश: इस तरह था।
कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – माधर&^%$, धौंस दिखाता है। चल नीचे उतर। इधर आ।
मैं पीछे पीछे भागा। उसने दिल्ली पुलिस के दूसरे सिपाही को चाबी दी। मेरा फोन और वॉलेट दोनों बगल की सीट पर रखे थे। मैंने कहा आप ऐसा नहीं कर सकते। अपने अधिकारी से बात कराइए।
कॉन्स्टेबल ग्यारसी लाल यादव – मैं ही अधिकारी हूं माधर^%$।
मैंने कहा आप इस तरह से बात नहीं कर सकते। तब तक उसने एक वैन में धकेल दिया था। मैंने कहा मोबाइल और वॉलेट दीजिए। तब तक दो इंस्पेक्टर समेत कई लोग वहां पहुंच चुके थे। एक का नाम शिवकुमार था, दूसरे का शायद विजय, तीसरे का ईश्वर सिंह, चौथे का बच्चा सिंह।
मैंने कहा आप इस तरह नहीं कर सकते। आप मेरा फोन और वॉलेट दीजिए।
तब तक इंस्पेक्टर शिवकुमार ने कहा ऐसे नहीं मानेगा मारो हरामी को। और गिरफ्तार करो।
इतना कहना था कि तीनों पुलिस वालों ने कार में ही पीटना शुरु कर दिया। ग्यारसी लाल यादव ने मेरा मुंह बंद कर दिया था ताकि मैं चिल्ला न सकूं। मैं आतंकित था।
आस पास के जिन गाड़ियों की चेकिंग चल रही थी वो जुटने लगे तो पुलिस ने पीटना बंद कर दिया। मैं दहशत के मारे कांप रहा था। मैंने अपना फोन मांगा। तो उन्होंने मुझे वैन से ही जोर से धक्का दे दिया। मैं सड़क पर गिर पड़ा। एक आदमी ने मेरा फोन लाकर दिया। मैंने तुरंत दफ्तर में फोन करके इसके बारे में बताया।
मैंने सिर्फ इतना पूछा कि आप लोग किस थाने में तैनात हैं। इंस्पेक्टर शिव कुमार ने छूटते ही कहा तुम्हारे बाप के थाने में। ग्यारसी लाल यादव ने कहा हो गया या और दूं। उन्हीं के बीच से एक आदमी चिल्लाया सफदरजंग थाने में हैं बता देना अपने बाप को।
कार में बैठा तो लगा जैसे किसी ने बदन से सारा खून निचोड़ लिया हो। मेरा दिमाग सुन्न था। आंखों के आगे कुछ नजर नहीं आ रहा था। समझ नहीं पा रहा था कि इतने आंसू कहां से आए।
मुझे पता है कि जिस व्यवस्था में हम सब जीते हैं वहां इस तरह की घटनाओं का कोई वजूद नहीं। मुझे यह भी पता है कि चौराहे पर किसी को पीट देना पुलिस की आचार संहिता में कानून व्यवस्था बनाए रखना का एक अनुशासन है। और मुझे यह भी पता है कि इस शिकायत का कोई अर्थ नहीं।
फिर भी मैं इसे इसलिए लिख रहा हूं ताकि यह दर्ज हो सके कि हमारे बोलने, हमारे लिखने और हम जिस माहौल में जी रहे हैं उसमें कितना अंतर है। हमारी भावनाएं कितने दोयम दर्जे की हैं। हमारे राष्ट्रवादी अनुशासन का बोध कितना झूठा, कितना मनगढ़ंत और कितना बनावटी है।
यह सब कुछ जब मैं लिख रहा हूं तो मेरे हाथ कांप रहे हैं। मेरा लहू थक्के की तरह जमा हुआ है। मेरी पलकें पहाड़ की तरह भारी हैं और लगता है जैसे अपनी चमड़ी को काटकर धो डालूं नहीं तो ये पिघल जाएगी। अपने आप से घिन्न सी आ रही है।
यह सब साझा करने का मकसद आपकी सांत्वना हासिल करना नहीं। सिर्फ इतना है कि आप इस भयावह दौर को महसूस कर सकें। जब हमारी नागरिकता का गौरव बोध किसी कॉन्स्टेबल, किसी एसआई के जूते के नीचे चौराहे पर कुचल दी जाने वाली चीज है।
मैं शब्दों में इसे बयान नहीं कर सकता कि यह कितना अपमानजनक, कितना डरावना और कितना तकलीफदेह है। ऐसा लगता है जैसे यह सदमा किसी चट्टान की तरह मेरे सीने पर बैठ गया है और मेरी जान ले लेगा। और यह लिखना आसान नहीं था।
आपका साथी
नवीन
दूसरे राज्यों से आ रहे यात्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय,हैदराबाद से आ रहे फंसे धनबाद में
धनबाद:कोयलांचल धनबाद में लगातार दूसरे राज्यों से लोग कोरोना के भय से पहुंच रहे हैं. वैसे लोग जो खासकर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के लिए गए थे वहां पर फैक्ट्रियां बंद होने की वजह से झारखंड वापस आ रहे हैं. ऐसा ही एक नजारा आज जिले के रणधीर वर्मा चौक पर देखने को मिला जो बमुश्किल से धनबाद तक पहुंच पाने में सफल हुए. लोगों को हजारीबाग के बरही अपने घर पहुंचना है.
आपको बता दें कि झारखंड के हजारीबाग के बरही के वैसे मजदूर जो हैदराबाद में काम कर रहे थे लेकिन वहां पर फैक्ट्रियां बंद होने की वजह से वे लोग किसी तरह हावड़ा तक पहुंचने में सफल हो पाए.हावड़ा पहुंचने के बाद वहां से एक मालवाहक गाड़ी रिजर्व कर 10 मजदूर झारखंड के लिए निकले लेकिन आज रणधीर वर्मा चौक पर पुलिस ने जांच के लिए उन्हें रोक लिया और उनकी जांच की गई. हालांकि जांच में कोई भी संदिग्ध सामने नहीं आए लेकिन उन्होंने जो अपनी दास्तान बताइए वह काफी दर्द भरी थी.
उन्होंने कहा कि वे लोग लगभग 4 दिनों से खाने के लिए तरस गए हैं. ट्रेनों में भी खाने को नहीं मिल रहा था और हावड़ा के बाद झारखंड के धनबाद पहुंचने तक भी उन्हें रास्ते में कहीं खाने-पीने की सामान नहीं मिल पाई है. अंत में जांच के बाद उन सभी मजदूरों को हजारीबाग के बरही जाने के लिए छोड़ दिया गया.
बगोदर में जनता कर्फ्यू को लेकर लोगों में दिखा उत्साह, घरो में रहें कैद,किया लॉक डाउन का स्वागत
जबकी आम दिनों में इन क्षेत्रो से निकलना मुश्किल होता था၊ बता दे की जनता कर्फ्यू के दौरान जैसे ही बजे की कहीं ताली तो कहीं थाली तो कहीं सुन्दर सुन्दर घण्टी की आवाज से चाहे वाह एक छोटा गाँव का टोला हैं, या बाजार सभी अपने अपने घरो के बाहर बजाते नजर आयें၊ वहीं बगोदर प्रशासन के द्वारा भी ठिक पाँच बजे ताली ओर थाली बजाते नजर आयें၊
बांग्लादेश सरकार ने इस्कॉन संतों को भारत में प्रवेश से रोका
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