
रांची : आज दिनांक 26 मार्च, दिन मंगलवार को राम लखन सिंह यादव महाविद्यालय, रांची में प्राचार्य डाॅ. मनोज कुमार की अध्यक्षता में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग में भाषाविद् डाॅ. जाॅन पीटरसन जर्मनी के कील स्थित क्रिश्चयन अल्ब्रेच्टस यूनिवर्सिटि में लिंग्वेटिक के प्रोफेसर के द्वारा भाषा-अध्ययन एवं शोध विषय पर अपना विचार रखें। झारखंड के भाषाओं के प्रति वे गहन अध्ययन कर व्याकरण पर भी कार्य किये हैं। विश्व के भाषाओं के साथ झारखंडी भाषाओं का संबंध एवं महत्व के बारे बताया। आगे उन्होंने झारखंड के आर्य भाषा परिवार में नागपुरी, कुरमालि, खोरठा, पंचपरगनिया, आॅस्ट्रिक भाषा परिवार के खड़िया, मुण्डारी, संताली, हो, द्रविड़ भाषा परिवार के कुड़ुख भाषाओं के महत्व एवं रहस्यों के बारे में भी बताया।

भाषा को लुप्त होने से बचाने के लिए घर-परिवार में अपनी भाषा में बात करने पर जोर दिया जाना आवश्यक है। झारखंडी भाषाओं में यहां के लोगों की आत्मा है, क्योंकि बहुत से भाषाओं में पारम्परिक रीति रिवाज एवं औषधीय गुणों के बारे में जानकरी मिलती है। उन्होंने कहा कि भाषाओं के अध्ययन में वैज्ञानिक तरीकों का प्रयोग करना चाहिये। कोई भी भाषाएं गलत नहीं हो सकती हैं। सभी भाषाएं स्टैंडर्ड होती हैं। हमारे लिये सिर्फ भाषाएँ हैं, शब्द हैं, मान्यताएं नहीं हो सकती। उन्होंने भाषाओं के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुये कहा कि भाषा अलग होती है और व्याकरण अलग। यह भाषा वैज्ञानिक के लिये भी जरुरी है। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में सात हजार भाषाएँ बोली जाती है। हरेक वर्ष कुछ भाषाएँ विलुप्त हो रही हैं। हमें भाषाओं के बीच के अन्तर और सामंजस्य को जानना होगा। भाषा विज्ञान के बारे में सीखना चाहिये साथ ही अपनी भाषाओं के बारे में खुद लिखना चाहिये। उन्होंने कहा कि भाषाओं को जानने व समझने के लिये फिल्ड वर्क होना चाहिये। लोगों के बीच जाकर बोलना और पूछना चाहिये।

विभागाध्यक्ष डाॅ. खालिक अहमद ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि डाॅ. पीटरसन जैसे विद्वानों का आना और भाषा के प्रति कार्य करने की रूचि को देखते ही बनती है। यहां के खड़िया और नागपुरी भाषाओं में कार्य किये हैं और आगे अन्य भाषाओं पर भी काम करना चाहते हैं। हमें भी अपनी भाषा और संस्कृति को बचाने के लिये जमीनी स्तर पर एक मुहिम छेड़ने की जरुरत है। उन्होंने कहा कि भाषा से ही हमारी पहचान है। मातृ भाषा हमारी आत्मा होती है, इसके बगैर हमारा कोई भी अस्तित्व नहीं है। जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रति लोगों की घटती रुचि पर चिंता व्यक्त करते हुये उन्होंने कहा कि हमें अपनी भाषाओं पर अधिक से अधिक लेखन कार्य करने की जरूरत है साथ ही लोगों को इसकी महत्ता से रुबरु कराने की भी आवश्यकता है ၊

रांची विश्वविद्यालय के प्राध्यापक बीरेन्द्र कुमार महतो ने डाॅ. पीटरसन के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि डाॅ. पीटरसन 2001 में झारखंड आये। खड़िया पर तीन डिक्शनरी लिखे। नागपुरी भाषा पर 2010 में डिक्शनरी पर काम किये। इसके साथ-साथ मुण्डारी, संताली, कुड़ुख आदि भाषाओ पर भी कार्य करने की रूची रखते हैं। श्री महतो ने कहा कि किसी व्यक्ति अथवा समुदाय को नष्ट करना है तो उनकी भाषा और संस्कृति को नष्ट कर दीजिये, वे स्वतः ही नष्ट हो जायेंगे। झारखंड की कई जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। हमें उन भाषाओं के संरक्षण और संवर्द्धन की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है।

प्राचार्य डाॅ. मनोज कुमार ने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि यह महाविद्यालय के इतिहास में आज स्वर्णिम दिन यानि गोल्डेन डे है जो जर्मनी के विद्वान झारखंडी भाषाओं पर कार्य कर रहे हैं और वैसे विद्वान का व्याख्यान काॅलेज में होना ही सौभाग्य की बात है। इसलिए लोगों को अपनी भाषा के प्रति शर्म नहीं होनी चाहिए बल्कि गर्व की बात है। हमें अपनी भाषा-संस्कृति को सजाने व संवारने का संकल्प लेना होगा। जब दूसरे देश के भाषा विद्वान हमारी भाषाओं को बचाने की दिशा में प्रयासरत हैं तो हम और आप यह कार्य क्यों नहीं कर सकते। उन्होंने खासकर के युवाओं से इस दिशा में आगे आने की बात कही।
इस मौके पर प्रोफेसर (डॉ.) पीटरसन एवं अन्य अतिथियों ने भाषा संस्कृति को बचाने के संकल्प के साथ महाविद्यालय परिसर में शाल (सखुआ) का पौधा लगाया। पौधा रोपण के पश्चात प्रोफेसर पीटरसन ने कहा कि मैंने जिंदगी में पहली बार कोई पौधा लगाया है। जिस तरह यह सखुआ का पौधा विशाल वृक्ष का रुप धारण करेगा, उसी प्रकार यहाँ की भाषाएँ समृद्ध हों ताकि यहाँ की संस्कृति पूरी दुनिया के लिये एक मिशाल बन सके। हम और अधिक उन्नत हों। क्योंकि भाषा और संस्कृति को बचाये रखने के लिये हमें स्वच्छ वातावरण की भी आवश्यकता होगी।
महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने पारम्परिक तरीके से अतिथियों का स्वागत किया। साथ ही सॉल और पुष्प गुच्छ देकर के अतिथियों का स्वागत किया गया। कुडुख भाषा के प्राध्यापक डाॅ. ए. खाखा ने स्वगत भाषण से अतिथियों का स्वागत किया।
मंच संचालन डाॅ. स्मिता किरण टोपो तथा धन्यवाद ज्ञापन डाॅ. दिनेश कुमार ने किया।
व्याख्यानमाला में मुख्य रुप से डाॅ. अजीत मुण्डा, प्रो. अमर कुमार, प्रो. सरोज कुमारी खलखो, डाॅ. किरण मिंज, प्रो. लाउलिन होरो, डाॅ. पारूल, डाॅ. मनीष चन्द्र टुडु डाॅ. स्नेहलता, डाॅ. कुमारी रीता, डाॅ. नीता लाल, डाॅ. मृदुला प्रसाद, डाॅ. विजय कुमार साथ ही छात्र-छात्राओं में पप्पु कुमार, सरिता कुमारी, सोनु सोपवार, संजय मुण्डा,सुनिता कुजुर, मनिता तिग्गा, अमन मुण्डा के अलावे महाविद्यालय के छात्र छात्राएं उपस्थित थे।