Saturday, October 1, 2022

एक ऐसा मंदिर जहां महिलाएं नही कर सकती हैं पूजा...



बोकारो।

झारखंड के बोकारो जिले में एक ऐसा देवी मंदिर है, जहां महिलाओ का प्रवेश वर्जित किया गया है। शारदीय नवरात्र मे जहां एक ओर देश भर में नारीशक्ति की पूजा की जा रही है, वहीं दूसरी ओर महिलाओ का पूजा के लिए प्रवेश वर्जित किया जाना एक अनबुझ पहेली बनी हुई है। इस संबंध में महिला श्रद्धालु ने बताया है कि दूर से भी जो मन्नत मांगते है वो पू lरा तो हो जाता है,लेकिन मंदिर में घुसकर पूजा करने की इच्छा होती है। लेकिन जो मान्यताएं हैं और जो घटनायें पूर्व मे घट चुकी हैं, उसके कारण डर लगता है। क्योंकि इस मंदिर मे पहले जो महिला घुसी थी, वहां अब पूजा नही होती है। भगवान ने सपने मे पुजारी को स्थान परिवर्तन करने को कहा और कहा कि यहां महिलाएं प्रवेश न करे। तब से बगल मे ही एक और मंदिर का निर्माण हुआ और वहीं पूजा अर्चना होने लगी है। माँ को सिन्दूर बहुत पसन्द है इसलिए सिन्दूर से माँ पूरी तरह से ढकी हुई रहती है।


महिलाएं 100 फुट दूर से ही मां दुर्गा की पूजा करती है। इतनी ही दूरी पर अगरबत्ती जलाकर एक सीमांकन किया हुआ है जहां से महिलाओ को एक कदम भी आगे नही जाना है। महिलाएं और लड़कियां श्रद्धालुओं के प्रसाद व अन्य पूजन सामग्री पुजारी आकर उस सीमांकन से ले जाते है। ऐसा नहीं है कि इन महिलाओं को अछूत मानकर या पुरूष वर्चस्व के कारण मंदिर के बाहर दूर से पूजा करना पड़ता है, बल्कि इसके पीछे 100 वर्ष पुरानी मान्यता और महिलाओं में अनहोनी होने का भय व्याप्त बताया जाता है। जिस कारण ही महिलाएं दूर से मां दुर्गा की उपासना व पूजा अर्चना करती हैं। मान्यता है कि जब कभी भी कोई महिला मंदिर के अंदर जा कर पूजा करती हैं, तो किसी अनहोनी का शिकार हो जाती हैं। गांव की सैंकडो महिलाएं इसकी गवाह हैं और महिलाओ के साथ साथ पूजारी भी कहते है कि एक बार एक महिला ने मंदिर के अंन्दर घुसकर पूजा करने की कोशिश की और बलि दिये हुए बकरे का प्रसाद रूपी मांस खाया, तो वह पागल हो गई। जिसके बाद पूजारी को देवी मंगलचन्डी का सपना आया कि आज के बाद से महिला मेरे मंदिर मे न आये, साथ ही जिस मंदिर में महिला गई थी उसका स्थान परिवर्तन किया जाय और नया स्थान मे मुझे स्थापित किया जाय। तब से आज तक मंदिर में न तो महिलाएं घुसकर पूजा अर्चना करती है और न ही चढाये हुए बकरे का मांस खाती है। यहां बलि चढ़ाये बकरे के सिर को जमीन मे गाड़ दिया जाता है और सीमांकित किए गये क्षेत्र में ही श्रद्धालु बकरे का भोज भात खा लेते है। साथ ही जिस पुरानी मंदिर मे महिला घुसी थी उसी के पास एक नये मंदिर


 का निर्माण किया गया और वहीं पूजा अर्चना होने लगी।  
यह मंदिर बोकारो जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर कसमार प्रखंड के टांगटोना पंचायत के कुसमाटाड़ गांव में स्थित है।

देश में अब तक के सबसे बड़े जब्ती 5,551.27 करोड़ की कार्रवाई



विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) की धारा 37ए के तहत नियुक्त सक्षम प्राधिकारी ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा चीनी फोन निर्माता शाओमी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ पारित 5,551.27 करोड़ रुपये के जब्ती आदेश की पुष्टि की. ईडी के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी. ईडी के अनुसार, यह भारत में जब्ती आदेश की अब तक की सबसे अधिक राशि है जिसकी पुष्टि प्राधिकरण ने अब तक की है.

प्राधिकरण ने जब्ती आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि शाओमी इंडिया द्वारा अनधिकृत तरीके से 5,551.27 करोड़ रुपये के बराबर विदेशी मुद्रा भारत से बाहर स्थानांतरित की गई है और इसे फेमा की धारा 37ए के प्रावधानों के अनुसार जब्त किया जा सकता है. सक्षम प्राधिकारी ने यह भी देखा कि रॉयल्टी का भुगतान भारत से विदेशी मुद्रा को स्थानांतरित करने के लिए एक उपकरण के अलावा और कुछ नहीं है और यह फेमा के प्रावधानों का घोर उल्लंघन है.

ईडी ने शाओमी इंडिया के 5,551.27 करोड़ रुपये जब्त किए थे
इससे पहले ईडी ने फेमा के प्रावधानों के तहत बैंक खातों में पड़े शाओमी इंडिया के 5,551.27 करोड़ रुपये जब्त किए थे.  कंपनी ने रॉयल्टी की आड़ में इस राशि को अनधिकृत रूप से विदेश में भेज दिया, जो फेमा की धारा 4 का उल्लंघन है. ईडी के अधिकारी ने कहा, "श्यओमी इंडिया चीन स्थित शाओमी समूह की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है. कंपनी के बैंक खातों में पड़ी 5,551.27 करोड़ रुपये की राशि को हमने जब्त कर लिया है."

कंपनी ने रॉयल्टी की आड़ में 5,551.27 करोड़ रुपये के बराबर विदेशी मुद्रा तीन विदेशी संस्थाओं को भेजी है, जिसमें एक शाओमी समूह की इकाई भी शामिल है. इतनी बड़ी रकम उसके चीनी मूल समूह की संस्थाओं के निर्देश पर भेजी गई थी. दो अन्य यूएस-आधारित असंबंधित संस्थाओं को प्रेषित राशि भी शाओमी समूह की संस्थाओं के अंतिम लाभ के लिए थी.

ईडी ने कहा कि कंपनी ने विदेशों में पैसा भेजते समय बैंकों को भ्रामक सूचनाएं भी मुहैया कराईं.

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायिनी की पूजा की जाती है,इनकी पूजा से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है

नवरात्रि छठा दिन - माँ कात्यायनी

चन्द्रहासोज्जवलकराशाईलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।




नवरात्रि के छठे दिन देवी के छठे स्वरूप माँ कात्यायिनी का पूजन किया जाता है। इनकी उपासना और आराधना से भक्तों को बड़ी आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है। उसके रोग, शोक, संताप और भय नष्ट हो जाते हैं।


नवरात्रि का छठवां दिन माता कात्यायनी को समर्पित होता है. माँ कात्यायनी को ही महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है. देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार

एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे. देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषियों के संकटों कोदूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं. महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था. जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं. महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें. देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्णचतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनोंतक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया.

माँ कात्यायिनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. ये अपनी प्रिय सवारी सिंह पर आरूढ रहती हैं. इनकी चार भुजाएं भक्तों को वरदान देती हैं. इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है. तो दूसरा वरदमुद्रा में है. अन्य हाथों में तलवार और कमल का फूल है.
इनका गुण शोध कार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायिनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं।
 

Friday, September 30, 2022

नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है, इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है



मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति का नाम स्कंदमाता है। स्कंदमाता का रूप बहुत ही अद्भुत है। उनकी चार भुजाएँ हैं। वह ऊपर की दाहिनी भुजा में स्कंद को गोद में और निचली भुजा में कमल का फूल धारण किए हुए हैं। ऊपर वाला बायां हाथ वर मुद्रा में है जबकि निचली भुजा में भी कमल का फूल है। उनका वर्ण बहुत श्वेत है। कमल आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासन भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है।

मां स्कंदमाता को सफेद रंग प्रिय है। यह रंग शांति, सद्भाव और सादगी का प्रतीक है। जहां तक ​​संभव हो, भक्त को पूजा के समय उसी रंग के कपड़े पहनने चाहिए। 

पांचवें दिन की पूजा में योगी का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में प्रविष्ट करता हैं। यह उनकी योग साधना का पांचवा दिन होता है। इसके सिद्ध होने से बुद्धि का विकास और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

महत्व 

मां स्कंदमाता अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इनकी पूजा करने से भक्त इस मृत्युलोक में भी परम सुख और शांति का अनुभव करने लगता है। वह अपनी सभी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर, मोक्ष प्राप्त करता है। जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा अवश्य करनी चाहिए। मां स्कंदमाता संतान प्राप्ति का वरदान देती हैं। जो कोई भी पूरी विधि-विधान से उनकी पूजा करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। लेकिन ध्यान रहे, स्कंदमाता की पूजा में कुमार कार्तिकेय का होना जरूरी है

Wednesday, September 28, 2022

माता दुर्गा के तीसरे रूप मां चंद्रघंटा की पूजा आज,इनका वाहन सिंह है



माता दुर्गा के तीसरे शक्तिरूप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचंद्र है, इस कारण माता के इस रूप का नाम चंद्रघंटा पड़ा। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं तथा सभी हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित है। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा यु़द्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। इनके घण्टे की भयानक चण्डध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं।
मां चंद्रघंटा को जागृत करने के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए- या देवी सर्वभू‍तेषु मां चन्द्रघण्टारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
अग्नि तत्व की तेजोमयी मूर्ति मां चंद्रघंटा अमृतमयी, स्वब्रह्मामयी रूपिणी है। चंद्र में प्रकाश सूर्य द्वारा प्रकाशित है। 

चंद्र अर्थात सोमरस प्रदान करने वाली, श्रेष्ठमयी, घण्टा अर्थात अग्नि शब्द ध्वनि का परिचायक, भगवती का अग्निमय, क्रियात्मक स्वरूप है। घण्टे से ब्रह्मनाद व अनहत नाद स्वरूपिणी हैं। घण्टे की ध्वनि से प्रेत-बाधादि से रक्षा होती है। इनकी आराधना से होने वाला एक बहुत बड़ा सद्गुण यह भी है कि वीरता-निर्भयता के साथ सौम्यता एवं विनम्रता का भी विकास होता है। माता के इस रूप की साधना करने से समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद प्राप्त होता है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन परम शक्तिदायक और कल्याणकारी स्वरूप की आराधना की जाती है

Tuesday, September 27, 2022

बिहार में वन देवी मानकर लोग कर रहे एटलस मॉथ की पूजा



बिहार के बगहा इलाके में दुनिया की सबसे बड़ी तितली एटलस मॉथ मिली है। जानकारी के मुताबिक, तितली हरनाटांड़ के गांव काला बैरिया में बैठी दिखी। इसके पंखों परसांप जैसी आकृति देख ग्रामीणों ने इसे नवरात्रि में वनदेवी मां समझ इसकी पूजा करनी शुरू कर दी। पहले तो ग्रामीण इसे सांप समझ कर डरे। मगर कुछ ग्रामीणों ने हिम्मत जुटाकर इसे पास जाकर देखा तो उन्हें इसका आकार व रंग रूप कुछ अलग दिखाई दिया। हालांकि एक बार तो गांव में डर का माहौल हो गया। मगर बाद में बारीकी से जांच की तो लोगों को ये देवी का अवतार लगी। इसके बाद गांव के लोगों ने इसकी पूजा शुरू कर दी। इसके आगे ग्रामीणों ने घी के दीपक जलाए तो कुछ ने अगरबत्तियां जलानी शुरू कर दी। हालांकि कुछ लोग इसे प्रेत मान रहे थे।
दुर्लभ प्रजाति की तितली है एटलस मॉथ
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट कमलेश मौर्य के मुताबिक, एटलस प्रजाति की यह तितली दुर्लभ है। इनमें एक खास बात ये होती है कि, अन्य जीवों के उलट फिमेल एटलस मेल से बड़ी होती है व सुंदर भी। इसके पंखों का फैलाव करीब 24 सेमी होता है। ये लॉयल होते हैं। फिमेल और मेल अंडे देने के बाद उनमें से प्यूपा निकलने के बाद एक साथ मौत का इंतजार करते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ मौर्य के मुताबिक, इसका दिखना एक सुखद संकेत है। मतलब कि, कोविड काल के दौरान प्रकृति ने खुद को रिपेयर किया है तो कई जीवों की दुर्लभ प्रजातियां फिर से पनपने लगी हैं।

कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से पहले ही अशोक गहलोत ने गांधी परिवार के मुकाबले में अपना गुट बनाया




खुली बगावत के बाद क्या अब अशोक गहलोत कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के लायक रहे हैं?

सवाल! अब सचिन पायलट की कांग्रेस में क्या भूमिका रहेगी?
एसपी मित्तल।
गांधी परिवार का भरोसा था कि अशोक गहलोत उनके सबसे भरोसेमंद नेता हैं, इसलिए गांधी परिवार ने गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने पर सहमति जताई। 17 अक्टूबर को होने वाले चुनाव के लिए गहलोत  को 27 सितंबर को नामांकन करना है, लेकिन अध्यक्ष बनने से पहले ही गहलोत ने कांग्रेस में गांधी परिवार के मुकाबले अपना गुट बना लिया है। 25 सितंबर को अशोक गहलोत (कांग्रेस नहीं) के शासन वाले राजस्थान के जयपुर में जो राजनीतिक संकट खड़ा हुआ, उसकी कल्पना गांधी परिवार खासकर सोनिया गांधी ने कभी नहीं की थी। गहलोत के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने पर राजस्थान में सरकार के नए मुख्यमंत्री के बारे में राय जानने के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के निर्देशों पर कांग्रेस के विधायकों की बैठक मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर रात 8 बजे बुलाई गई। चूंकि अभी सोनिया गांधी ही कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष है, इसलिए राज्यसभा में प्रतिपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े और प्रदेश प्रभारी अजय माकन को ऑब्र्जवर बना कर भेजा गया। लेकिन इसे गांधी परिवार के लिए शर्मनाक स्थिति ही कहा जाएगा कि बैठक में गहलोत गुट का कोई भी विधायक नहीं आया। संभवत: कांग्रेस के इतिहास में यह पहला अवसर होगा, जब विधायकों ने कांग्रेस के ऑब्र्जवरों की इतनी बेईज्जती की हो। गांधी परिवार के लिए गंभीर बात तो यह है कि दिखाने के लिए अशोक गहलोत अपने सरकारी आवास पर बैठक की तैयारी करते रहे और समर्थक विधायक वरिष्ठ मंत्री शांति धारीवाल के आवास पर एकत्रित होते रहे। नए मुख्यमंत्री के बारे में राय देने के बजाए गहलोत समर्थक विधायकों ने गांधी परिवार द्वारा बुलाई बैठक पर ही आपत्ति कर दी। गहलोत के विधायकों ने कहा कि नए मुख्यमंत्री के बारे में राय जानने का जो तरीका अपनाया है, उससे नाराज होकर हम सभी  विधायक पद से इस्तीफा दे रहे हैं। प्रदेश में 200 में से 106 कांग्रेस के विधायक हैं और 93 विधायकों ने गहलोत के प्रति अपना समर्थन जताया है। गांधी परिवार किसे मुख्यमंत्री बनाएगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है, लेकिन गहलोत को आशंका है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। पायलट को रोकने के लिए ही गहलोत ने गांधी परिवार के खिलाफ खुली बगावत कर दी है। इसे कांग्रेस में होने वाला मजाक ही कहा जाएगा कि गहलोत गुट जिन सीपी जोशी को नया सीएम बनाने की मांग कर रहा है, उन्हीं सीपी जोशी को विधानसभा अध्यक्ष की हैसियत से इस्तीफे का सामूहिक पत्र दिया जा रहा है।
  
क्या गहलोत अब अध्यक्ष बनने के लायक हैं:
मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए अशोक गहलोत ने जो खुली बगावत की है, उसमें सवाल उठता है कि क्या अब गहलोत कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के लायक रहे हैं? सवाल यह भी है कि आखिर पिछले 40 वर्षों से गांधी परिवार ने गहलोत को क्या नहीं दिया? परसराम मदेरणा से लेकर सचिन पायलट तक का हक मार कर गहलोत  को राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया और अब जब गांधी परिवार के प्रति वफादारी दिखाने की बात सामने आई तो खुली बगावत कर दी। कांग्रेस में तो यही परंपरा रही है कि विधायक दल की बैठक में मुख्यमंत्री का निर्णय हाईकमान पर ही छोड़ा जाता है, लेकिन आज इस परंपरा को गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद अशोक गहलोत ने ही तोड़ दिया हे। सवाल उठता है कि 1998, 2008 और 2018 में गहलोत ने कांग्रेस विधायकों की राय को तवज्जो क्यों नहीं दी? असल में तब गांधी परिवार ने गहलोत को ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया। हालांकि तब गहलोत को विधायकों का समर्थन नहीं था। लेकिन तब भी कांग्रेस विधायकों ने हाईकमान के निर्णय को स्वीकार किया। 2018 में तो हाईकमान ने गहलोत को तब सीएम बनाया, जब कांग्रेस को जीत सचिन पायलट के नेतृत्व में मिली थी। अशोक गहलोत बगावत तब कर रहे हैं, जब उनके नेतृत्व में कांग्रेस सरकार कभी रिपीट नहीं हुई। गहलोत के सीएम रहते एक बार 56 और दूसरी बार मात्र 21 सीटें मिली।
  
पायलट की अब क्या भूमिका होगी?
93 कांग्रेस विधायकों की राय के बाद सवाल उठता है कि कांग्रेस में अब सचिन पायलट की क्या भूमिका होगी? पायलट को मुख्यमंत्री पद से रोकने के लिए अशोक गहलोत को जो कुछ भी करना था वह उन्होंने कर दिया है। पायलट को भले ही कांग्रेस हाईकमान का समर्थन हो, लेकिन अब पायलट का राजस्थान का मुख्यमंत्री बनना संभव नहीं है। ऐसे में पायलट की भूमिका के बारे में आने वाले दिनों में पता चलेगा। 


बांग्लादेश सरकार ने इस्कॉन संतों को भारत में प्रवेश से रोका

चौंकाने वाली खबर 🚨  बांग्लादेश ने 63 इस्कॉन भिक्षुओं को भारत में प्रवेश करने से रोका सभी के पास वैध पासपोर्ट और वीज़ा थे। आव्रज...