जमशेदपुर।
Sunday, October 2, 2022
झारखंड के जमशेदपुर में गरीब तबके के लोगों को नहीं मिलता है, भोग का प्रसाद: सुधीर कुमार पप्पू
जमशेदपुर।
नवरात्र के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा;विधान व मंत्र
Saturday, October 1, 2022
एक ऐसा मंदिर जहां महिलाएं नही कर सकती हैं पूजा...

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नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायिनी की पूजा की जाती है,इनकी पूजा से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति होती है
नवरात्रि छठा दिन - माँ कात्यायनी
चन्द्रहासोज्जवलकराशाईलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।
नवरात्रि का छठवां दिन माता कात्यायनी को समर्पित होता है. माँ कात्यायनी को ही महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है. देवी कात्यायनी जी के संदर्भ में एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार
एक समय कत नाम के प्रसिद्ध ॠषि हुए तथा उनके पुत्र ॠषि कात्य हुए, उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध कात्य गोत्र से, विश्वप्रसिद्ध ॠषि कात्यायन उत्पन्न हुए थे. देवी कात्यायनी जी देवताओं ,ऋषियों के संकटों कोदूर करने लिए महर्षि कात्यायन के आश्रम में उत्पन्न होती हैं. महर्षि कात्यायन जी ने देवी पालन पोषण किया था. जब महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बहुत बढ़ गया था, तब उसका विनाश करने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने अपने तेज़ और प्रताप का अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था और ॠषि कात्यायन ने भगवती जी कि कठिन तपस्या, पूजा की इसी कारण से यह देवी कात्यायनी कहलायीं. महर्षि कात्यायन जी की इच्छा थी कि भगवती उनके घर में पुत्री के रूप में जन्म लें. देवी ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार की तथा अश्विन कृष्णचतुर्दशी को जन्म लेने के पश्चात शुक्ल सप्तमी, अष्टमी और नवमी, तीन दिनोंतक कात्यायन ॠषि ने इनकी पूजा की, दशमी को देवी ने महिषासुर का वध किया ओर देवों को महिषासुर के अत्याचारों से मुक्त किया.
माँ कात्यायिनी का स्वरूप अत्यंत दिव्य और स्वर्ण के समान चमकीला है. ये अपनी प्रिय सवारी सिंह पर आरूढ रहती हैं. इनकी चार भुजाएं भक्तों को वरदान देती हैं. इनका एक हाथ अभय मुद्रा में है. तो दूसरा वरदमुद्रा में है. अन्य हाथों में तलवार और कमल का फूल है.
इनका गुण शोध कार्य है। इसीलिए इस वैज्ञानिक युग में कात्यायिनी का महत्व सर्वाधिक हो जाता है। इनकी कृपा से ही सारे कार्य पूरे जो जाते हैं।
Friday, September 30, 2022
नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है, इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है
मां दुर्गा की पांचवीं शक्ति का नाम स्कंदमाता है। स्कंदमाता का रूप बहुत ही अद्भुत है। उनकी चार भुजाएँ हैं। वह ऊपर की दाहिनी भुजा में स्कंद को गोद में और निचली भुजा में कमल का फूल धारण किए हुए हैं। ऊपर वाला बायां हाथ वर मुद्रा में है जबकि निचली भुजा में भी कमल का फूल है। उनका वर्ण बहुत श्वेत है। कमल आसन पर विराजमान होने के कारण इन्हें पद्मासन भी कहा जाता है। इनका वाहन सिंह है।
मां स्कंदमाता को सफेद रंग प्रिय है। यह रंग शांति, सद्भाव और सादगी का प्रतीक है। जहां तक संभव हो, भक्त को पूजा के समय उसी रंग के कपड़े पहनने चाहिए।
पांचवें दिन की पूजा में योगी का मन ‘विशुद्ध’ चक्र में प्रविष्ट करता हैं। यह उनकी योग साधना का पांचवा दिन होता है। इसके सिद्ध होने से बुद्धि का विकास और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
महत्व
मां स्कंदमाता अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं। इनकी पूजा करने से भक्त इस मृत्युलोक में भी परम सुख और शांति का अनुभव करने लगता है। वह अपनी सभी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर, मोक्ष प्राप्त करता है। जो दंपत्ति संतान सुख से वंचित हैं, उन्हें मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा अवश्य करनी चाहिए। मां स्कंदमाता संतान प्राप्ति का वरदान देती हैं। जो कोई भी पूरी विधि-विधान से उनकी पूजा करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। लेकिन ध्यान रहे, स्कंदमाता की पूजा में कुमार कार्तिकेय का होना जरूरी है
Wednesday, September 28, 2022
माता दुर्गा के तीसरे रूप मां चंद्रघंटा की पूजा आज,इनका वाहन सिंह है
माता दुर्गा के तीसरे शक्तिरूप का नाम चंद्रघंटा है। इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचंद्र है, इस कारण माता के इस रूप का नाम चंद्रघंटा पड़ा। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं तथा सभी हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित है। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा यु़द्ध के लिए उद्यत रहने की होती है। इनके घण्टे की भयानक चण्डध्वनि से अत्याचारी दानव-दैत्य-राक्षस सदैव प्रकम्पित रहते हैं।
मां चंद्रघंटा को जागृत करने के लिए इस मंत्र का जप करना चाहिए- या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघण्टारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥
अग्नि तत्व की तेजोमयी मूर्ति मां चंद्रघंटा अमृतमयी, स्वब्रह्मामयी रूपिणी है। चंद्र में प्रकाश सूर्य द्वारा प्रकाशित है।
बांग्लादेश सरकार ने इस्कॉन संतों को भारत में प्रवेश से रोका
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