Wednesday, November 28, 2018

गिरिडीह:स्मृति शेष आजसू केन्द्रीय महासचिव दामोदर प्रसाद महतो को दी श्रद्धांजलि

:स्मृति शेष आजसू केन्द्रीय महासचिव दामोदर प्रसाद महतो को

श्रद्धांजलि देने हेतु मंगलवार को उनके पैतृक आवास परसाटांड़ में एक

श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया।श्रद्धांजलि सभा में आजसू के

साथ साथ विभिन्न दलों के नेता,कार्यकर्ता,समर्थक व शुभचिंतक 

शामिल हुए । श्रद्धांजलि सभा में शामिल होने वालों में स्थानीय विधायकजगरनाथ महतो, टुंडी विधायक राजकिशोर महतो गांडेय विधायक,जयप्रकाश वर्मा पूर्व विधायक उमाकांत रजक आजसू गिरिडीह जिलाध्यक्ष गुड्डु यादव, आजसू महिला मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष वायलट कच्छप ,रांची जिप उपाध्यक्ष पार्वती देवी, आजसू नेता जिवाधन महतो ,बीस सूत्री अध्यक्ष लालमोहन महतो झामुमो नेता कैलाश चौधरी, डेगलाल महतो,राजकुमार पांडेय,निरंजन महतो आजसू केन्द्रीय महासचिव संतोष महतो सचिव बैजनाथ महतो,लंबोदर महतो जिला परिषद टिकैट महतो छात्र संघ से रंधीर वर्मा,पिन्टू कुमार,महेश वर्मा जिला अध्यक्ष गुड्डू यादव जिला सचिव अनुप पांडेय,मुन्ना महतो,संतोष महतो,मोनू कुमार,योगेन्द्र महतो,बासुदेव महतो आजसू प्रखण्ड अध्यक्ष काशी महतो,छक्कन महतो,रामप्रसाद महतो,पप्पू महतो एसबीएमसी प्रतापपुर के संचालक प्रमोद बरनवाल,रूस्तम अंसारी,जयकांत महतो,अजीत माथुर,राजकमल महतो,दुलारचन्द महतो,झारखंडी यादव डुमरी संत कुमार बंका,जितेन्द्र महतो,सुबोध सिन्हा,सुरेन्द्र कुमार टाईगर फोर्स नेता महावीर सिंह पारा शिक्षक संघ के अध्यक्ष मनोज मंडल आदि शामिल हुए।

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Tuesday, November 27, 2018

गिरिडीह : संविधान दिवस पर डुमरी के कई संस्थानों में कार्यक्रम हुए

गिरिडीह :  विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सोमवार को संविधान दिवस मनाया गया। इस दौरान संस्थानों से जुड़े सदस्यों ने संविधान में उल्लेखित प्रस्तावना को पढ़ उसका अनुसरण करने का शपथ लिया।

 आईके जायसवाल उच्च विद्यालय प्रांगण में संविधान दिवस का आयोजन किया गया ,जिसमें विद्यार्थियों,शिक्षक-शिक्षिकाओं एवं उपस्थित जनों ने संविधान के मूल पवित्र उद्देश्यों को अक्षुण बनाने का संकल्प लिया साथ ही निहित उद्देश्यों पर चर्चा की गई। उपस्थित जनों से विद्यालय संस्थापक इन्द्रजीत कुमार जायसवाल ने कहा कि हमें सभी को संविधान के मूल उद्देश्यों की रक्षा करनी है। कारण कि लोग संविधान के साथ छेड़छाड़ और खिलवाड़ करने में लगे हैं,ऐसे समाज विरोधी व राष्ट्र विरोधी तत्वों का डटकर मुकाबला कर संविधान के निर्देशों को बनाए रखने में अपनी भूमिका निभानी होगी।मौके पर राजेन्द्र प्रसाद, सुषमा कुमारी,शारदा कुमारी,मीरा बरनंवाल आदि उपस्थित थे।पीएनडी जैन उच्च विद्यालय में आयोजित संविधान दिवस कार्यक्रम में उपस्थित छात्र छात्राओं को संविधान बनाने के उद्देश्यों एवं देश की व्यवस्था की संचालन में योगदान पर विस्तृत जानकारी दी।इस दौरान छात्र छात्राओं के बीच संविधान से संबंधित प्रश्न प्रतियोगिता आयोजित की गई। बालक एवं बालिका वर्ग में आहुत प्रतियोगिता में बालिका वर्ग की ईशिका,रिया, अंजली,साक्षी,रानी व प्रज्ञा की टीम ने बालक वर्ग के सूरज,संतोष, अनिष व विशाल की टीम को 15-5 अंकों से पराजित किया। कार्यक्रम की सफलता में विद्यालय शिक्षक कृष्ण कुमार सिंह,प्रमोद यादव,श्याम सिंह,भैयालाल जैन,देवेश कुमार,विवेक जैन,मिथिलेश कुमार,रूपलाल मंडल,दयानंद कुमार,आकाश जैन,विनय जैन,एतवारी महतो आदि की भूमिका सराहनीय रही। वहीं स्वयंसेवी संस्था जनप्रकाश फाउण्डेशन के कार्यालय में भी संविधान दिवस मनाया गया।इस दौरान संस्था सचिव वेदप्रकाश पाठक,रूपलाल महतो,जुगनू महतो,खगेश्वर महतो,कैलाश, अलखनाथ चौधरी,महेन्द्र मंडल आदि उपस्थित थे। प्रोजेक्ट कन्या उच्च विद्यालय डुमरी में आयोजित संविधान दिवस पर शिक्षकों व छात्राओं ने एक जागरूकता रैली निकाली जो आसपास क्षेत्रों का भ्रमण किया। इस दौरान स्कूल के वरीय शिक्षक रवीन्द्र प्रसाद ने संविधान की जानकारी दी। मौके पर प्राचार्य अरूण कुमार सिंह शिक्षक अवधेश कुमार शिक्षिका अमृता सिंह,सुनैना रानी आदेशपाल सौरभ नंदी,दिनेश यादव उपस्थित थे। वहीं डीएवी सेन्ट्रल स्कूल, इसरीबाजार में आयोजित संविधान दिवसपर विद्यालय प्राचार्या रिया तिवारी ने बच्चों को संविधान की जानकारी दी।


पेड न्यूज: अब निशाने पर है 'पेड न्यूज' का बढ़ता चलन, खोखली होती मानसिकता

वरिष्ठ पत्रकार और भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य जयशंकर गुप्त पेड न्यूज़ के कांसेप्ट के बारे में बताते हैं, "शायद 1998-99 की बात है, तब अजीत जोगी कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हुआ करते थे, एक दिन एक प्रेस कांफ्रेंस के बाद उन्होंने अनौपचारिक बातचीत में बताया कि इस बार मध्य प्रदेश (मौजूदा छत्तीसगढ़) के उम्मीदवार ने ज़्यादा पैसे मांगे हैं, वजह पूछने पर बताया कि अख़बार वालों ने कहा कवरेज कराने के लिए पैकेज लेना होगा. अख़बार वालों ने विपक्षी उम्मीदवार से भी पैसे मांगे हैं."

1998-99 में उस वक्त जिस अख़बार का जिक्र अजीत जोगी के सामने हुआ था वह तेजी से उभरता हुआ समूह था जो अपना विस्तार करने में जुटा हुआ था.

इस अख़बार के पेड न्यूज़ के पैकेज में केवल ये शामिल था कि रोज़ाना उम्मीदवार ने किन-किन इलाकों का दौरा किया है और अख़बार में उसकी तस्वीर सहित बस यही जानकारी छपेगी.

तबसे लेकर पेड न्यूज़ का दख़ल लगातार बढ़ता ही गया है.

राज्यसभा के मौजूदा उपसभापति और दशकों तक प्रभात ख़बर के चीफ़ एडिटर की भूमिका निभा चुके हरिवंश कहते हैं, "पत्रकारिता में पेड न्यूज़ का चलन पहले भी था लेकिन उदारीकरण के बाद जिस तरह सबकुछ बाज़ार की शक्तियों के हवाले होता गया है, उसका असर अख़बारों और बाद में टीवी चैनलों पर भी पड़ा. मुनाफ़ा कमाने का दबाव बढ़ता गया."

ये दबाव कितना अधिक होता है, इस बारे में बीते 12 सालों से विभिन्न अख़बार समूहों में लीडरशिप की भूमिका निभा रहे और इंडिया न्यूज़ समूह के चीफ़ एडिटर अजय कुमार शुक्ल बताते हैं, "मीडिया घरानों पर भी रेवेन्यू जेनरेट करने का दबाव रहता है और जब रेवेन्यू में हिस्सेदारी लेने वालों की संख्या बढ़ रही हो तो ये दबाव और भी बढ़ जाता है, तो पेड सप्लीमेंट या चैनलों पर पेड स्लॉट तो रखने पड़ते हैं. लेकिन मेरी अपनी कोशिश ये होती है कि पॉलिटिकल ख़बरों को इससे बचाया जाए."

कितना होता है दबाव

आप चाहे जिस भी स्तर का अख़बार या चैनल चला रहे हों, राजस्व जुटाने की चिंता सबको होती है.

इस बारे में आईबीएन18 समूह के संस्थापक संपादक और वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई बताते हैं, "दबाव तो होता है, कई बार मुश्किल स्थिति होती है, जब हमलोगों ने आईबीएन शुरू किया था तो अंग्रेज़ी-हिंदी में तो ऐसी स्थिति मेरे सामने नहीं आई थी लेकिन आईबीएन-लोकमत मराठी चैनल को लेकर ये स्थिति आ गई थी कि पेड स्लॉट नहीं करेंगे तो चलेगा कैसे. लेकिन मैं अड़ा था कि अगर पैसा लेकर कार्यक्रम करना हुआ तो उसका डिस्क्लोज़र भी दिखाई देना चाहिए."

दैनिक भास्कर और नई दुनिया अख़बार में जनरल मैनेजर रहे मनोज त्रिवेदी बताते हैं, "चुनाव के वक्त एक तरह से अख़बार समूह के लिए रेवेन्यू बढ़ाने का मौक़ा होता है. तो वे इस तरह की रणनीति अपनाते हैं जिससे नेताओं से कमाई हो सके."

"इसके लिए कई तरह के विकल्प भी रखने होते हैं और रकम जुटाने को लेकर लचीला रुख़ होता है, जिसके पॉकेट से जितना पैसा निकल सकता है, उतना पैसा निकालने की जुगत होती है, जैसे मुंह देखकर चंदन लगाया जाता है, बस वैसे ही काम होता है."

सरकार ने पेड न्यूज को ले इन 52 अखबारों को डीएवीपी की चाबूक लगा दो माह तक विज्ञापन सूची से बाहर रखने का सख्त आदेश जारी किया. वे हैं:

  कितनी सच्चाई है?

क्या अब मीडिया के ज़रिये साज़िशें भी कराई जा सकती हैं:

चुनाव के दिनों में पेड न्यूज़ का स्वरूप कैसा हो सकता है, इस बारे में परंजॉय गुहा ठाकुरता बताते हैं, "हम तो जब रिपोर्ट तैयार कर रहे थे तब ये देखकर अचरज में पड़ गए थे कि एक अख़बार ने एक ही पन्ने पर एक ही जैसे अंदाज़ में एक क्षेत्र की दो ख़बरें छापी थीं, एक ख़बर में एक उम्मीदवार को जिताया जा रहा था, और दूसरी ख़बर में दूसरे उम्मीदवार को जिताया जा रहा था. बताइए ये कैसे हो सकता है?"

प्रबंधन क्या - क्या करता है ?

ये ख़बरों की दुनिया में किस तरह व्याप्त है, इसका अंदाज़ा कुछ उदाहरणों से लगाया जा सकता है.

एक तेलुगू अख़बार के संपादक के मुताबिक़ उनका अख़बार प्रबंधन हर चुनाव से पहले रेट कार्ड के हिसाब से पेड न्यूज़ के ऑफ़र उम्मीदवारों के सामने रखता रहा है.

एक मेट्रो शहर से चलने वाले एक टीवी चैनल ने अपने यहां की प्रोग्रामिंग चौबीस घंटे में ऐसे बना ली कि पहले आधे घंटे में एक सीट से एक उम्मीदवार जीत रहा होता था और दूसरे आधे घंटे में उसी सीट से दूसरे उम्मीदवार का पलड़ा मज़बूत बताया जाता था.

एक मराठी चैनल ने चुनाव से ठीक दो दिन पहले इस तरह की व्यवस्था कर दी कि शिवसेना से संबंधित कोई ख़बर टीवी चैनल पर दिखी ही नहीं.

झारखंड से प्रकाशित एक दैनिक में विपक्षी उम्मीदवार के समर्थन में प्रमुख नेताओं का जमावड़ा हुआ तो ये तय माना जा रहा था कि ये ख़बर पहले पन्ने पर जगह पाएगी, राज्य सरकार का प्रसार विभाग तत्काल हरकत में आया और उसने अख़बार के पहले दो पन्नों का 'जैकेट विज्ञापन' जारी कर दिया, और लोगों को विपक्षी उम्मीदवार की स्थिति का अंदाज़ा तीसरे पन्ने पर जाकर हुआ.

हरिवंश बताते हैं, "पेड न्यूज़ का तंत्र इतना संगठित रूप ले चुका है कि 2009 में प्रभाष जोशी, कुलदीप नैयर, बीजी वर्गीज, अजीत भट्टाचार्य जी ने पेड न्यूज़ पर एक जांच रिपोर्ट तैयार की थी, मैं भी शामिल था, वह रिपोर्ट सार्वजनिक ही नहीं हो पाई."

पटना के वरिष्ठ पत्रकार और मौर्या टीवी के संपादक रहे नवेंदू पेड न्यूज़ के चलन पर कहते हैं, "वह जमाना था जब कोई रिपोर्टर किसी फायदे के लिए कोई ख़बर लिख देता था, लेकिन पत्रकारिता में सबसे पहले रिपोर्टरों को संपादकों ने ख़त्म किया, फिर ख़बरें संपादक स्तर पर मैनेज होने लगीं, लेकिन जल्दी ही मालिकों और प्रोमोटरों ने संपादक नाम की संस्था को ख़त्म कर दिया. तो पेड न्यूज़ के ज़्यादा बड़े मामले अब मालिकों के स्तर पर ही हो जाते हैं."

इंडिया न्यूज़ में चीफ़ एडिटर अजय शुक्ल बताते हैं, "रेवेन्यू बनाने के लिए तरकीबें तो निकाली जाती हैं, इससे प्रबंधन का फ़ायदा भी होता है लेकिन इससे हमारी पत्रकारिता का नुकसान हो रहा है, आम लोगों के बीच हमारी साख प्रभावित हो रही है."

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि मीडिया की जो बीमारी पत्रकारों के रास्ते अब प्रबंधन का हिस्सा बन चुकी है, उस पर अंकुश कैसे लगाया जाए.

इस बारे में कई वर्षों तक अखबार समूह में जनरल मैनेजर रहे मनोज त्रिवेदी कहते हैं, "पेड न्यूज़ को काफ़ी हद तक इंस्टीट्यूशनल बना दिया गया है, जनता को खुद ही फर्क करना होगा कि कौन सा न्यूज़ है और कौन सा पेड न्यूज़."

राजदीप सरदेसाई कहते हैं, "जिस तरह से 2009-10 में पेड न्यूज़ के ख़िलाफ़ आवाज़ उठी थी, वैसी कोशिश अब नहीं दिखाई देती है, ये चिंताजनक तस्वीर है."

हरिवंश के मुताबिक ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाना अंतिम लक्ष्य है और इसमें कोई एक ज़्यादा दोषी है दूसरा कम, ऐसा नहीं है, सब शामिल हैं.

हरिवंश कहते हैं, "आप अगर लोकसभा और राज्य सभा की रिकॉर्डिंग उठाकर देख लें तो ना जाने कितने नेताओं ने कितने मौक़ों पर पेड न्यूज़ से पीड़ित होने की बात कही है, दोहराई है. लेकिन अंकुश नहीं लग पाया है."

कैसे रुकेगा ये चलन?

मौजूदा व्यवस्था में पेड न्यूज़, ख़ासकर चुनाव के दिनों में छपने वाले पेड न्यूज़ की शिकायत आप चुनाव आयोग और भारतीय प्रेस परिषद से कर सकते हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की शिकायत चुनाव आयोग से नेशनल ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीएसए) से करने का प्रावधान है.

लेकिन ये देखने में आया है कि यहां शिकायतों पर कार्रवाई करने में लंबा वक्त लगता है और कई मामलों में इसे साबित करना भी मुमकिन नहीं होता है.

ऐसे में इस पर रोक लगाने की कोशिशों की हवा निकल जाती है.

पेड न्यूज़ की वजहों पर मौजूदा केंद्र सरकार में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की अध्यक्षता वाली पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ऑन इंफ़ॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी ने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी.


'फ़ेक न्यूज़' के ख़िलाफ़ क्या है तैयारी

इस रिपोर्ट में उन तमाम पहलुओं का ज़िक्र है, जिसके चलते पेड न्यूज़ की बीमारी का चलन बढ़ रहा है.

इसके मुताबिक मीडिया में काँट्रैक्ट सिस्टम की नौकरियों और पत्रकारों का कम वेतनमान भी पेड न्यूज़ को बढ़ावा दे रहा है, साथ ही मीडिया कंपनियों के स्वामित्व के बदलते स्वरूप का असर भी हो रहा है.

इस रिपोर्ट में ये माना गया है कि सरकारी विज्ञापनों के ज़रिए सरकारें मीडिया हाउसेज़ पर दबाव बनाती रहती हैं.

इस रिपोर्ट में प्रेस काउंसिल जैसी संस्थाओं को प्रभावी बनाने से लेकर नियामक संस्था बनाने तक की बात कही गई है.

लेकिन मुख्यधारा की मीडिया में बीते तीन दशकों से ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने का ज़ोर बढ़ा है.

ऐसे में किसी नैतिकता और आदर्श की बात को बहुत ज़्यादा अहमियत नहीं रह जाती है.

वैसे अख़बारों में जगह बेचने का कॉन्सेप्ट भारत के सबसे बड़े अख़बार समूह ने इससे पहले शुरू कर दिया था जिसमें वो अपने लोकल सप्लीमेंट में मैरिज एनिवर्सरी, बर्थडे पार्टी, मुंडन और शादी जैसी चीज़ों को छापने के लिए पैसे लेने लगे थे.

लेकिन ये घोषित तौर पर पेड सप्लीमेंट माने जाने लगे थे और ये वो पन्ने थे जिनमें समाचार नहीं छपते थे.

लेकिन एंटरटेंनमेंट लोकल सप्लीमेंट में जगह बेचने का कांसेप्ट समय के साथ बदले हुए अंदाज़ में आजकल किस तरह फैल गया है, इस बारे में टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह और एनडीटीवी ग्रुप में मुख्य कार्यकारी अधिकारी रह चुके समीर कपूर बताते हैं, "मौजूदा समय में साफ़ नज़र आता है कि पूरा का पूरा चैनल या पूरा का पूरा अख़बार पेड जैसा बर्ताव कर रहे हैं. लगातार एकपक्षीय ख़बर आपको दिखाई देते हैं. किसी को सिर्फ तारीफ़ तारीफ़ दिख रही है तो किसी को केवल आलोचना ही आलोचना."

क़ानून से बदलेगी तस्वीर

परंजॉय गुहा ठाकुरता इस पर रोक लगने की संभावनाओं के बारे में कहते हैं, "देखिए लोगों में जागरुकता का स्तर बढ़ रहा है, निर्वाचन आयोग भी इसको लेकर तरह-तरह के प्रावधान कर रही है, तो लोगों को पता चल रहा है कि ये जो ख़बर है वो किसी ने पैसे देकर छपवाई हो सकती है."

हरिवंश पेड न्यूज़ के चलन पर रोक लगाने की किसी संभावना के बारे में कहते हैं, "मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं है, ऐसा करने के लिए ना केवल राजनीतिक दलों के नेतृत्व को सामने आना होगा बल्कि उन्हें मीडिया समूहों के मालिकों के साथ मिलकर बैठना होगा. इस बीमारी को दूर करने के लिए बात करनी होगी, सभी साझेदारों को समझना होगा कि इससे मीडिया की छवि का नुकसान हो रहा है."

अजीत जोगी ने तब पत्रकारों से ये भी बताया था कि उन्होंने उस उम्मीदवार से कहा था कि दोनों मिलकर बात कर लो और दोनों मिलकर किसी अख़बार को पैसे नहीं दो.

परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "अगर राजनीतिक दल के प्रतिनिधि मिलकर संसद के अंदर रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ पीपल्स एक्ट, 1954 में बदलाव करके पेड न्यूज़ को दंडनीय अपराध बना दें, तो ये स्थिति बदलेगी."

राजदीप सरदेसाई के मुताबिक 'क़ानून बनने से डर तो बढ़ेगा. निश्चित तौर पर.'

हालांकि पेड न्यूज़ पर अंकुश लगाने के लिए ऐसे किसी क़ानून की सुगबुगाहट नहीं दिखाई दे रही है.

ऐसे समय में, अपने राजनीतिक करियर में पैसों के इस्तेमाल के चलते बदनाम हुए अजीत जोगी अब भले अपने परिवार और छत्तीसगढ़ तक सिमट गए हों लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने जो सलाह 1998-99 में तबके अपने उम्मीदवार को दी थी, वही पेड न्यूज़ के चलन को रोकने का एकमात्र कारगर उपाय दिखता है, वो सलाह थी- 'दोनों उम्मीदवार मिलकर आपस में बात कर लो और कोई भी किसी अख़बार वाले को पैसे मत दो.'

(श्रोत:बीबीसी)

गिरिडीह: कुरमी विकास मोर्चा के नये जिलाध्यक्ष निरंजन व राज्य प्रवक्ता बैजनाथ का जोरदार स्वागत

गिरिडीह:कुरमी विकास मोर्चा गिरिडीह इकाई द्वारा सोमवार को डाक बंगला परिसर में एक समारोह का आयोजन कर मोर्चा के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष निरंजन प्रसाद महतो एवं प्रदेश प्रवक्ता बैजनाथ

महतो का फूल माला पहना कर स्वागत किया गया।नवनियुक्त जिलाध्यक्ष ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा व पक्षपात रहित करने एवं स्वजातीय संगठन को और धारदार बनाने की बात कही।                          साथ ही पारा शिक्षक आंदोलन का समर्थन की घोषणा की। उन्होंने कहा कि हक

व अधिकार के लिए संगठन हमेशा तत्पर रहेगा।स्वागत करने वालों में

मोर्चा के युवा विंग के जिलाध्यक्ष थानेश्वर महतो सचिव रामचन्द्र महतो,

डेगलाल महतो,बासुदेव महतो अधिवक्ता छत्रधारी महतो व विजय कुमार पंसस पंकज कुमार,नीलकंठ महतो,बैजनाथ अकेला आदि उपस्थित थे।

फोटो:@#$%^&*& नवनियुक्त जिलाध्यक्ष का स्वागत करते लोग

अब सस्ता मिलेगा गैस सिलेंडर, होंगे कुछ ऐसे बदलाव

नई दिल्ली: कुकिंग गैस की कीमतों में नियंत्रण करने का सरकार ने मन बना लिया है ၊ रसोई गैस की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सरकार ने सब्सिडी की राशि खाते में जमा करने की व्यवस्था में बदलाव करने का फैसला किया है. सरकार ने यह फैसला कई ग्राहकों को एकमुश्त राशि चुकाने में आ रही दिक्कतों को देखकर लिया है. अब उपभोक्ताओं को सब्सिडी की कीमत में ही गैस सिलिंडर मिलेगा और सब्सिडी की राशि का भुगतान सरकार ग्राहकों को करने  के बजाय सीधे पेट्रोलिम कंपनियों को करेगी.

जानकारी के अनुसार पेट्रोलियम मंत्रालय गैस सिलिंडर की बढ़ती कीमतों को देखते हुए सब्सिडी देने के लिए जल्द नया तरीका अपनाने की तैयारी में है. इसके लिए गैस सब्सिडी का नया सॉफ्टवेर बनाया जा रहा है. इसके तहत गैस उपभोक्ताओं को सिलिंडर की सिर्फ सब्सिडी कीमत ही देनी होगी. वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि डीबीटी के नए तरीके में गैस बुक होने के बाद उपभोक्ता के मोबाइल पर एसएमएस के जरिए एक कोड भेजा जाएगा. गैस सिलिंडर आने पर उपभोक्ता को वह कोड दिखाना होगा. इसके बाद सरकार सब्सिडी की राशि सीधे कंपनी को भुगतान करेगी. ऐसे में उपभोक्ता को सिर्फ गैस सिलिंडर के सब्सिडी के दाम ही चुकाने होंगे.

दुनिया के 5 बड़े संगठनों ने अमरीका पर डाला दबाव कि यमन युद्ध में सऊदी गठबंधन की सैन्य सहायता त्वरित रोके, जिससे लाखों लोगों की जानें बचे

 दुनिया के 5 बड़े सहायता संगठनों ने अमरीका पर बल दिया है कि वह यमन युद्ध में सऊदी गठबंधन की सैन्य सहायता त्वरित रोक दे जिससे लाखों लोगों की जानें बच जाएंगी।

समाचार एजेन्सी एपी की रिपोर्ट के अनुसार इन्टरनेश्नल रेस्क्यू कमेटी, आक्सफ़ॅाम अमरीका, केयर यूएस, सेव चिल्ड्रेन और नार्वेजियन रिफ़्यूजी काउंसिल की ओर से यमन में सऊदी गठबंधन और यमन के बीच जारी युद्ध को रोकने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र जारी किया गया।

बयान में कहा गया है कि यमन में यदि दोनों पक्षों की ओर से अपनी कार्यवाही को तुरंत बदला न गया तो एक करोड़ 40 लाख लोगों की जानें ख़तरे में होंगी।

बयान में कहा गया है कि दोनों ओर से अपनी प्रतिक्रियाओं और नीतियों से यमन की अर्थव्यवस्था की अनदेखी की गयी है जिसके कारण मंहगाई में निरंतर वृद्धि हो रही है और मुद्रा के मूल्य में भी कमी आई है।

सहायता संगठनों का कहना है कि भूख को यमन के नागरिकों के विरुद्ध हथियार के रूप में कदापि प्रयोग नहीं करना चाहिए।

सऊदी गठबंधन के घटक अमरीका से मांग करते हुए इन संगठनों का कहना था कि अमरीका, यमन में गृहयुद्ध को तुरंत समाप्त कराने के लिए विशेषकर सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात पर कूटनयिक दबाव द्वारा अपना प्रभाव प्रयोग करे।

Monday, November 26, 2018

Mumbai :~Police constable of Mahim PS committed suicide last night at Worli he was on sick leave

Mumbai Alerts :~Police constable Vinod Jadhav of Mahim Police Station committed suicide last night at his home Worli he was on sick leave.

Police Constable no. 113146 Shri.Vinod Vitthal JADHAV, 28 yrs . Res. Room no.3 ,Bld. No. C/4/1, Sir pochkanwala Rd.Worli (w) Attached to Mahim police station since 20/06/18.

He made Sucide in his residence by hanging on 25/11/18 at.23.55

He was absent on duty since dt. 3/11/18 he was affected by hepatitis 

Worli Pstn .ADR No. 98/18 has Registered .Body send for PM to Nair Hospital, IO PSI Patil .Mo No.9821691325.

His brother Vijaykumar Vitthal JADHAV , PC no. 0850/Attached to Gavdevi Pstn.was with him.

बांग्लादेश सरकार ने इस्कॉन संतों को भारत में प्रवेश से रोका

चौंकाने वाली खबर 🚨  बांग्लादेश ने 63 इस्कॉन भिक्षुओं को भारत में प्रवेश करने से रोका सभी के पास वैध पासपोर्ट और वीज़ा थे। आव्रज...