मुंबई में एशिया की सबसे बड़ी स्लम बस्ती धारावी में कोरोना से पीड़ित व्यक्ति की बुधवार को मौत से झारखंड प्रवासी मजदूर दहशत के माहौल में जीने पर मजबूर हैं।जानकारी के अनुसार धारावी मुंबई में 15 लाख लोगों की घनी आबादी वाला क्षेत्र है, जहां पर झारखंड के लगभग दस हजार से अधिक की संख्या में दिहाड़ी मजदूर और छोटे कारोबारी रहते हैं।यहाँ जानकारी के मुताबिक, मुंबई के धारावी में बसे स्लम को एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी के तौर पर जाना जाता है।यहां करीब 15 लाख लोग रहते हैं।सिर्फ इस इलाके का टर्न ओवर 10 करोड़ से अधिक है।यहां एक झोपड़ी की कीमत भी इसी वजह से अब 50 स ,60 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है।
बता दे, मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियां और चॉल में यह वायरस तेजी से फैल रहा है और यहां पर इसे काबू पाना प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती है।प्रवासी मजदूरों हितार्थ में कार्य करने वाले समाजसेवी सिकन्दर अली का कहना हैं कि इस वायरस को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग सबसे अहम हैं और इन घनी बस्तियों में यह संभव नहीं हो पा रहा हैं।अब तक बस्तियों में आठ लोग कोरोना पॉजिटिव हो चुके है।
लेकिन सामाजिक दूरी इन मलिन बस्तियों और चॉलों में संभव नहीं है। झुग्गी बस्तियों में ज्यादातर घरों में टिन की चादरें एक साथ रखी जाती हैं और यहां रहने वाले लोग सामुदायिक शौचालयों का उपयोग करते हैं।चॉलों में तो 8X10 के कमरों में सामान्यता छह लोग तक रहते हैं। यहां के लोगों में बीमारी रोकना शुरू से ही स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी चुनौती रहा है।ऐसे में झारखंड सरकार को महाराष्ट्र सरकार से बात कर झारखंड प्रवासी मजदूरों के बचाव के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत हैं।
बता दे, मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियां और चॉल में यह वायरस तेजी से फैल रहा है और यहां पर इसे काबू पाना प्रशासन की सबसे बड़ी चुनौती है।प्रवासी मजदूरों हितार्थ में कार्य करने वाले समाजसेवी सिकन्दर अली का कहना हैं कि इस वायरस को रोकने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग सबसे अहम हैं और इन घनी बस्तियों में यह संभव नहीं हो पा रहा हैं।अब तक बस्तियों में आठ लोग कोरोना पॉजिटिव हो चुके है।
लेकिन सामाजिक दूरी इन मलिन बस्तियों और चॉलों में संभव नहीं है। झुग्गी बस्तियों में ज्यादातर घरों में टिन की चादरें एक साथ रखी जाती हैं और यहां रहने वाले लोग सामुदायिक शौचालयों का उपयोग करते हैं।चॉलों में तो 8X10 के कमरों में सामान्यता छह लोग तक रहते हैं। यहां के लोगों में बीमारी रोकना शुरू से ही स्वास्थ्य विभाग के लिए बड़ी चुनौती रहा है।ऐसे में झारखंड सरकार को महाराष्ट्र सरकार से बात कर झारखंड प्रवासी मजदूरों के बचाव के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत हैं।



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