चिल्ला चिल्ली वाले, टेलीविज़न वाले, कई सज्जन, खुद ही सवाल करते हैं और खुद ही जवाब भी देते हैं । इन्हे पत्रकार कहना तो उचित नहीं लगता इसलिए सज्जन शब्द ही उचित है क्यूंकि अभी भी बहुत से अच्छे पत्रकार हैं जो मीडिया की गरिमा को बनाये हुए हैं । मीडिया की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता गिराने में सबसे ज्यादा योगदान इसी तरह के लोगो ने किया है।
खुद पर प्रश्न उठते ही भृकुटी क्यों तन जाती है ? अगर कोई उनसे प्रश्न कर ले तो पूरी भाव भंगिमा एक बिगड़े हुए राजनीतिज्ञ जैसी हो जाती है। अगर आपको दूसरो को ऐसी तैसी करने में मज़ा आता है तो वह सुख लेने का दूसरो को भी तो अधिकार है। क्यों होड़ लगी है आप में लोगो में चिल्ला चिल्ला कर अपने सोच थोपने की।
ये कौन सा तरीका है बहस करवाने का। क्या प्रजातंत्र में ऐसे ही बहस होनी चाहिए। बाकायदा झगड़ा करवाया जाता है लोगो को भड़का कर। पत्रकारों का काम है एक आयने जैसे जो हो रहा है उसे दिखाना न कि कुछ लोगो की सोच का ढोल पीटना। हर कोई देख सकता है कि पूरा का पूरा प्लेटफार्म किस तरह से कुछ गिने चुने लोगो को दे दिया गया है। राजनैतिक पार्टियों के लोगो के बात तो समझ में आती है लेकिन अब जनता की बात रखने वाले कुछ खास नाम और चेहरे ही हैं जिनको जनता सुन सुन कर थक चुकी है।
चिल्ला चिल्ली वाले दोस्तों, कृपया जनता के बीच जाइये और करिये कुछ गंभीर चर्च। वहां भी झगड़ा न करवाइये बहस के नाम पर। पहले आयना खुद को दिखाईये और फिर दूसरो को।
राजीव तिवारी
फाउंडर, मीडिया नेटवर्क,पूर्व जनरल मैनेजर एवं प्रकाशक इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली