न्यूज डेस्क ၊ इतना तो तय है कि लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने हमें अशिक्षित माना था. पर यह भी तय है कि उसने हमें शिक्षित करने का ईमानदार प्रयास किया था. ब्रिटिश सरकार ने उस वक़्त ईस्ट इंडिया कंपनी को भारत में शिक्षा के लिए एक लाख रुपये आवंटित करने का हुक्म दिया था, उस समय यह बहस उठी था कि किस माध्यम से पढ़ाया जाएगा. देशज या कुछ और? इंग्लैड के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में बोलते हुए मैकाले ने कहा था, ‘ये हम पर निर्भर करता है कि हम भारतीयों के साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहते हैं. क्या हम उन्हें अधीन बनाये रखना चाहते हैं? क्या हम समझते हैं कि हम भारतीयों में जाग्रति पैदा किये बगैर उन्हें ज्ञान दे सकते हैं? क्या हम उनमें महत्वाकांक्षा तो भर दें पर उसे बाहर निकालने का रास्ता न सुझाएं? बहुत संभव है कि भारतीय जनमानस हमारे द्वारा बनाई गई प्रणाली से पढ़ता हुआ उस प्रणाली से आगे निकल जाए: बेहतर सरकार देकर हम उनमें अच्छी सरकार बनाने की प्रेरणा दें. हमारी प्रणाली से पढ़कर संभव है, कि एक दिन वे यूरोप के जैसे संस्थान बनाने की इच्छा करें. क्या ऐसा दिन भारत में आएगा? मैं नहीं जानता. हां, पर ये ज़रूर जानता हूं कि मैं वो शख्स नहीं जो भारतीयों को पीछे धकेल दूं. या उस दिन को आने से रोक दूं. और कभी ऐसा दिन आया, तो इंग्लैंड के इतिहास में वो सबसे गौरवशाली क्षण होगा.’
मिनट ऑफ़ एजुकेशन’ पर बोलते हुए उसने आगे कहा, ‘हम अंग्रेज़ी बोलने वालों का एक ऐसा वर्ग तैयार करें जो हमारे और शासित लोगों के बीच पुल का काम करें. उनका रंग और खून तो भारतीय हो, पर सोच, नैतिकता और बुद्धिमता अंग्रेजों के मुक़ाबिल हो.’
मैकाले का यह भी मानना था कि अंग्रेज़ अपने सीमित साधनों से इस महासागर को शिक्षित नहीं कर पाएंगे. लिहाज़ा, उसने सुझाव दिया कि अंग्रेजी बोलने वाले भारतीयों को यह काम दिया जाये कि वे हिंदुस्तान की बोलियों और भाषाओं के भीतर पश्चिम के वैज्ञानिक तथ्य और जानकारी मिलाकर यहां के लोगों को पढ़ाएं.
यह बात अपने आप में मौलिक प्रतीत होती है. मैकाले समझता था कि अंग्रेजी और यहां की भाषाएं मिलकर ही भारतीयों का ज्ञान बढ़ा सकती हैं. अंग्रेजी भाषा को शिक्षा का आधार बनाने पर आज बहस होती है, पर उसने इसी भाषा में हमे पढ़ाने का प्रयास किया. उसके मुताबिक हिंदुस्तानियों को पढ़ाने की ज़िम्मेदारी अंग्रेजों की है, पर उन्हें मातृभाषा में नहीं पढ़ाया जा सकता. ऐसे में अंग्रेजी, जो यूरोप की सर्वश्रेठ भाषा है और भारतीय श्रेष्ठि वर्ग इसको समझता है, लिहाज़ा, यह एक बेहतर माध्यम है. उसने आगे कहा, ‘पश्चिम यूरोप ने रूस को सभ्य बनाया और कोई शक नहीं है कि हिंदुओं को हम सभ्य बनायेंगे.’

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