हम छोड़ चले है मेहफिल को
याद आए कभी तो मत रोना
*उर्दू शायर शान भारती नहीं रहे*
उनकी उर्दू साहित्य की सेवा को फरामोश नहीं किया जा सकता ---ग़ुलाम ग़ौस 'आसवी'
धनबाद । शनिवार को कोयलांल नें एक अनमोल नगीना खो दिया , कोयलांचल के प्रसिद्ध उर्दू शायर (72 वर्षीय) शान भारती नहीं रहे। सिजुआ 22/ 12 में रहने वाले शान भारती ने रिम्स, राँची में अंतिम सांस ली। शान भारती ने उर्दू साहित्य की सेवा में अपने 60 साल व्यतीत कर दिए।
शायर ग़ुलाम ग़ौस 'आसवी' ने कहा कि उन्होंने कोयलांचल से छपने वाली त्रैमासिक पत्रिका 'रंग' के द्वारा उर्दू साहित्य की जो सेवा की है, उसे कभी भी फरामोश नहीं किया जा सकता। उन्होंने 'रंग' का धनबाद से 87 अंक पाठकों के सामने पेश किए। उनके चले जाने से उर्दू साहित्यिक जगत का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। उनके ग़ज़ल के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं। हाल ही में उनके द्वारा लिखित गजल संग्रह 'नदी का जब किनारा डूबता है' को बिहार उर्दू अकादमी के द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
झरिया में अदबी महफ़िल के आयोजन के अवसर पर उर्दू त्रैमासिक पत्रिका 'रंग' के सम्पादक व सिजुआ के रहने वाले उस्ताद शायर शान भारती ने यह शेर सुनाया था– "मैंने अब खुद को बना डाला है पत्थर की तरह, / वो अगर मुझसे ख़फ़ा है, तो ख़फ़ा रहने दे।"

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