गिरिडीह:सोमवार को जिले के पारसनाथ स्थित पीडब्ल्यूआई के सेक्शन इंजीनियर जावेद कमर जो चौधरी बांध के निकट रेलवे लाइन में काम करवा रहे थे ၊ अचानक बारिश होने के कारण अपने अधीनस्थ कार्य कर रहे रेलवे कर्मियों के साथ एक पेड़ के नीचे बारिश से बचने के लिए गए ၊ इसी दौरान अचानक वज्रपात की घटना हुई ၊जिसमें सेक्शन इंजीनियर सहित मौजूद रेलवेकर्मी वज्रपात के प्रभावित होकर गिर पड़े। वहीं वज्रपात से सोमवारी पूजा करने जा रही एक लड़की की मौत निमियाघाट थाना क्षेत्र में हो गई ၊ उधर चौधरीबांध हॉल्ट स्टेशन में ग्रामीणों द्वारा इस घटना की जानकारी चौधरीबांध रेलवे स्टेशन को दी गई तत्पश्चात रेलवे कर्मचारियों ने अपनी तत्परता दिखाते पारसनाथ स्टेशन प्रबंधक को घटना की जानकारी देते हुए घायलों को धनबाद रेलवे अस्पताल ले जाया गया परंतु तब तक जावेद कमर की मौत हो चुकी थी।घटना में घायल रेल कर्मियों का इलाज रेलवे अस्पताल में ही चल रहा है।सभी घायल खतरे से बाहर बताया जा रहे हैं।पारसनाथ रेलवे प्रबंधक बी दुबे ने बताया कि सभी मजदूर जो वज्रपात के लाइटिंग से मूर्छित हुए थे खतरे से बाहर हैं और उनका इलाज चल रहा है।बताया गया की मृतक जावेद के परिजनों को घटना की सूचना दे दी गई है।उन्होंने बताया मृतक मृतक जावेद बिहार के नवादा के रहने वाले थे तथा 2006 में रेलवे की नौकरी ज्वाइन कर 2016 से बतौर सेक्शन इंजीनियर पारसनाथ पीडब्ल्यू आई के अंतर्गत कार्यरत थे।
Tuesday, July 23, 2019
वज्रपात के कारण दो की मौत , कई रेलकर्मी हुए घायल
Monday, July 22, 2019
प्रेमी युगल हत्याकांड का पुलिस ने किया खुलासा, भाई ही निकला बहन का कातिल
गिरिडीह में झारखंड प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन ने शहरी क्षेत्र में एक भव्य रैली निकाली
गिरिडीह में झारखंड प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन की ओर से सोमवार को शहरी क्षेत्र में एक भव्य रैली निकाली गई, और अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद की गयी। बताया गया कि निजी विद्यालयों को मान्यता हेतु शर्तों में संशोधन करने को ले म यह विरोध प्रदर्शन किया गया था ၊ शिक्षा, अधिकार, नियमावली में संशोधन कर निजी विद्यालयों की मान्यता हेतु 25 जून 2019 को जारी अधिसूचना में जिन शर्तों को निर्धारित किया गया है, वह अत्यंत ही कठोर हैं।
जिसे छोटे निजी विद्यालयों द्वारा पूरा कर पाना असंभव है। ऐसी स्थिति में सरकार अगर नियमों में बदलाव नहीं करती है, तो पूरे राज्य में लगभग 95% विद्यालय बंद हो जाएंगे। जिससे लाखों शिक्षक बेरोजगार होंगे, और लाखों लाख बच्चों का भविष्य अधर में लटक जाएगा। यहा इस कार्यक्रम की अगुवाई राम रंजन सिंह, दिनेश साहू, समेत हजारो की संख्या में शिक्षकों ने रैली में भाग लिया ၊ तमाम लोग समाहरणालय पहुंचे जहां एसोसिएशन का एक शिष्टमंडल राज्यपाल के नाम उपायुक्त को एक ज्ञापन सौंपा।
भिलाईःअर्पण स्कूल में मंदबुद्धि बच्चों का मासिक स्वास्थ्य परीक्षण की गई
अभी भी चेत जाएँ,भारतीय समाज मे बेटा-बेटी मे असन्तुलन की गम्भीर स्थिति उत्पन्न हो रही है
भारतीय समाज में बेटा-बेटी में फर्क करने की मानसिकता में बदलाव लाने और लड़कियों की दशा और दिशा सुधारने के लिए पिछले कुछ वर्षों से सरकारी स्तर पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे कई महत्वपूर्ण अभियान चलाए जाने के बावजूद हाल ही में ‘नीति आयोग’ की जो चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है, वह बेहद चिंताजनक है। ‘हैल्दी स्टेट्स एंड प्रोग्रेसिव इंडिया’ (स्वस्थ राज्य और प्रगतिशील भारत) नामक इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 21 बड़े राज्यों में से 17 में लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है।
जन्म के समय लिंगानुपात मामले में 10 या उससे अधिक अंकों की गिरावट वाले राज्यों में प्रधानमंत्री के गृह राज्य ‘गुजरात’ की हालत सबसे खराब है, जहां लिंगानुपात 53 अंकों की गिरावट के साथ 907 से घटकर महज 854 रह गया है। कन्या भ्रूण हत्या के लिए पहले से ही बदनाम हरियाणा लिंगानुपात मामले में 35 अंकों की गिरावट के साथ दूसरे स्थान पर है जबकि राजस्थान में 32, उत्तराखण्ड 27, महाराष्ट्र 18, हिमाचल प्रदेश 14, छत्तीसगढ़ 12 और कर्नाटक में 11 अंकों की गिरावट दर्ज की गई है।
हालांकि पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में लिंगानुपात में क्रमश: 19, 10 व 9 अंकों का सुधार हुआ है, जो आशाजनक तो है किन्तु यह स्थिति भी ऐसी नहीं है, जिसे लेकर हम ज्यादा उत्साहित हो सकें क्योंकि लिंगानुपात में मामूली सुधार के बावजूद इन राज्यों की स्थिति भी इस मामले में कोई बहुत बेहतर नहीं है। नीति आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी भी प्रति 1000 पुरूषों पर महिलाओं की संख्या मात्र 879 है जबकि बिहार में यह संख्या 916 है।
वर्तमान केन्द्र सरकार द्वारा शुरू से ही ‘कन्या भ्रूण हत्या’ को निरूत्साहित करने के लिए जिस तरह की योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाता रहा है, उसके बावजूद लिंगानुपात के बिगड़ते संतुलन की इस तरह की रिपोर्ट सामने आना वाकई हमारे लिए गंभीर चुनौती है।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘लाडली बेटी योजना’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ सरीखी सरकारी योजनाओं के अलावा विशेष रूप से मीडिया द्वारा चलाया गया कैंपेन ‘सेल्फी विद डॉटर’ नारी सशक्तिकरण की दिशा में बहुत अच्छे प्रयास किए गए किन्तु हालिया रिपोर्ट को देखें तो इन महत्वाकांक्षी योजनाओं के परिणाम आशाजनक नहीं रहे।
ऐसे में यह गंभीर सवाल उठ खड़ा जाता है कि आखिर हमारे प्रयासों में कहां कमी रह गई?दरअसल हम आज भले ही 21वीं सदी में जी रहे हैं किन्तु हमारी रूढ़िवादी मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आया है। लिंग परीक्षण को लेकर देश में कड़े कानूनों के बावजूद आज भी अधिकांश लोग बेटे की ख्वाहिश के चलते लिंग परीक्षण का सहारा ले रहे हैं, जिससे कन्या भ्रूण हत्याएं जारी हैं या फिर बेटे की चाह में ज्यादा बच्चों को जन्म दे रहे हैं, जिससे अनचाही लड़कियों की संख्या बढ़ रही है।
इकोनॉमिक सर्वे 2017-18 की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में इस दौरान 2.1 करोड़ अनचाही लड़कियों का जन्म हुआ है। एक अन्य रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ है कि पिछले कई वर्षों से प्रतिवर्ष देश में 3 से 7 लाख कन्या भ्रूण नष्ट कर दिए जाते रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप देश में महिलाओं की संख्या पुरूषों की तुलना में करीब पांच करोड़ कम है।
विड़म्बना ही है कि नारी को या तो जन्म लेने से पहले ही कन्या भ्रूण हत्या के रूप में समाप्त करने के प्रयास होते हैं या फिर उसे दहेज की बलिवेदी पर जिंदा जला डालने की कुत्सित कोशिशें।
यह अजीब विड़म्बना है कि एक ओर जहां हिन्दुओं में लड़की को ‘घर की लक्ष्मी’ अथवा ‘देवी’, वहीं मुस्लिमों में बेटियों को ‘नेमत’ माना गया है, उसके बाद भी लड़कियों के साथ जिस तरह का दोयम व्यवहार किया जा रहा है, वह न केवल हमारी खोखली और विकलांग सामाजिक मानसिकता का परिचायक है, वहीं हमारी कथित आधुनिकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त है।
आधुनिक युग में भी हमारी विकलांग मानसिकता का अनुमान इस उदाहरण से सहजता से लगाया जा सकता है। हाल ही में राजस्थान के करौली जिले में एक 83 वर्षीय बुजुर्ग सुखराम बैरवा ने अपनी पत्नी की सहमति से अपने से 53 वर्ष छोटी युवती रमेशी बैरवा से सिर्फ इसलिए शादी की ताकि उसे पुत्र की प्राप्ति हो सके क्योंकि उसे अपनी पहली पत्नी से पुत्र प्राप्त नहीं हुआ था।
हालांकि पहले माना जाता था कि लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन का बड़ा कारण समाज में अशिक्षा और अंधविश्वास है और इसी कारण लड़के-लड़कियों में भेदभाव किया जाता रहा है किन्तु आज शिक्षित समाज में भी इस समस्या का निदान होने के बजाय यह समस्या नासूर की भांति फैल रही है बल्कि जिस प्रकार हालिया रिपोर्ट में देखा गया है कि देश के न्यूनतम साक्षर राज्य बिहार में लिंगानुपात की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है और शिक्षित राज्यों में हालत बिगड़ी है, यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।
देश में जहां वर्ष 1950 में लैंगिक अनुपात 970 के करीब था, वह वर्ष 2011 की जनगणना में 939 रह गया था। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी लैंगिक अनुपात में आई गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए इसका कारण जानना चाहा था। एक सरकारी अध्ययन में तो यह भी सामने आया है कि अगर यही हालात रहे तो वर्ष 2031 तक प्रति 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या सिर्फ 898 रह जाएगी।
लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन के खतरनाक परिणामों का आभास इसी से हो जाता है कि आज कुछ जगहों पर लोग बेटों की शादी के लिए दूसरे राज्यों से गरीब परिवारों की लड़कियों को खरीदकर लाने लगे हैं। ‘कन्या भ्रूण हत्या’ के लिए बदनाम हरियाणा जैसे राज्य में तो ‘मोलकी’ नामक यह प्रथा कुछ ज्यादा ही प्रचलित हो रही है।
दूसरी ओर लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों के अपहरण की घटनाएं भी जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे हमारा सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो रहा है। हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की एक रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है कि देशभर में कुल 66225 लड़कियों का अपहरण हुआ, जिनमें से 33855 लड़कियों का अपहरण सिर्फ शादी के लिए ही किया गया।
नीति आयोग की रिपोर्ट में ‘पूर्व गभार्धान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994’ (पीसीपीएनडीटी) को लागू करने तथा लड़कियों के महत्व के बारे में प्रचार करने के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया गया है और राज्यों से लिंग चयन कर गर्भपात की प्रवृत्ति पर कड़ाई से अंकुश लगाने का आग्रह किया गया है।
हालांकि यह सुखद बात है कि हमारे समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है बल्कि कई क्षेत्रों में लड़कियां लड़कों से कहीं आगे हैं लेकिन लैंगिक असमानता को लेकर जब तक लोगों की मानसिकता में अपेक्षित बदलाव नहीं आता, हालात में सुधार की उम्मीद बेमानी होगी।
जहां तक लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने की बात है तो नारी सशक्तिकरण और बेटियों को गरिमामयी जीवन देने के लिए सरकार द्वारा कई बेहतरीन योजनाएं तो चलाई जा रही हैं लेकिन यहां यह ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि विभिन्न सरकारी योजनाएं सरकारी फाइलों या विभिन्न मंचों पर सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा फोटो खिंचवाने की प्रथा तक ही सीमित होकर रह जाएं। इसके लिए युद्धस्तर पर जनजागरण अभियान की भी महत्ती आवश्यकता है।
Sunday, July 21, 2019
रांची में चोरी डकैती के वारदात में चड्डी बनियान गिरोह की बात सामने आयी
रांची:लीजिए, रांचीवासियों के लिए एक हैरतअंगेेज खबर है ၊ राजधानी पुलिस के लिए चड्डी बनियान गिरोह एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.इस गिरोह के द्वारा राजधानी रांची में एक के बाद एक बड़ी डकैती की घटना को अंजाम दिया जा रहा है.एक डकैती की घटना का खुला पुलिस कर नहीं पाती है, तब तक दूसरी घटना घटित हो जाती है. राजधानी रांची में हो रहे अधिकतर डकैती की घटनाओं के पीछे चड्डी बनियान गिरोह का हाथ सामने आया है.यह गिरोह काफी ही खूंखार माना जाता है और कई देश के कई राज्य में घूम-घूम कर डकैती की घटना को भी अंजाम देते रहते हैं.देशभर में खूंखार माना जाने वाला कच्छा बनियान गिरोह जो कि लूट और हत्या जैसे गंभीर अपराधों के लिए जाना जाता है. यह गिरोह रात के अंधेरे में चड्डी बनियान पहनकर अपने मुंह पर कपड़ा बांधकर लूट और चोरी की वारदात को अंजाम देते हैं. उस दौरान उनके सामने जो भी आता है या तो उसको अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है या फिर घायल होना पड़ता है. यह गिरोह किसी भी घटना का अंजाम समूह में देते हैं.जिसमें कम से कम 8 से 10 अपराधी शामिल रहते है.
रात में घरों में चोरी की घटना को अंजाम देते है.यह गिरोह के लोग घर का ताला काटकर या फिर बाउंड्री को तड़प कर घर में प्रवेश करते हैं फिर सभी घरवालों को कब्जे में लेकर चोरी की घटना का अंजाम देकर आसानी से फरार हो जाते है.
कोयलांचल में गरीबो के मसीहा कामरेड ए के राय क निधन;कोल्फील्ड मे शोक की लहर
धनबाद.
पूर्व सांसद एके राय का रविवार को निधन हो गया। वो काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। उन्हें 8 जुलाई को केंद्रीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तब से उनका इलाज चल रहा था। मजदूरों के नेता के रूप में विख्यात एके राय 84 साल के थे।
धनबाद से तीन बार सांसद रहने के साथ ही एके राय सिंदरी विधानसभा क्षेत्र से भी तीन बार विधायक रहे थे। ज्ञात हो कि बुखार हाेने की स्थिति में एके राय को 8 जुलाई काे सेंट्रल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। लेकिन, तबीयत में सुधार नहीं हुआ। उनकी स्थिति बिगड़ती ही चली गई।
मार्क्सवादी समन्वय समिति मासस के संस्थापक अरुण कुमार राय (एके राय) पहली बार 1977 में धनबाद से बतौर निर्दलीय चुनाव लड़े और सांसद बने। उन्हें जनता पार्टी का समर्थन प्राप्त था और जेपी लहर का फायदा भी मिला। वे 1980 व 1989 के लोकसभा चुनावों में भी विजयी रहे थे।
बांग्लादेश सरकार ने इस्कॉन संतों को भारत में प्रवेश से रोका
चौंकाने वाली खबर 🚨 बांग्लादेश ने 63 इस्कॉन भिक्षुओं को भारत में प्रवेश करने से रोका सभी के पास वैध पासपोर्ट और वीज़ा थे। आव्रज...
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Nationalism is a political, social, and economic ideology and movement characterized by the promotion of the interests of a particular nati...
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एक बुराई आपकी सारी अच्छाइयों पर पानी फेर देती है और आप देवताओं की नजरों में भी नीचे गिर जाते हैं। विद्वान और प्रकांड पंडित होने से आप अच्छे...
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झारखण्ड में जैसे युवतियों,महिलाओं और बच्चियों को जलाकर हत्या कर दिए जाने का ट्रेंड निकल पड़ा है।रोजाना इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं।जो अ...











