गिरिडीह जिले की महत्वपूर्ण डुमरी विधानसभा सीट के परिणाम का आभास मतदाताओं को मतदान के 2 दिन बाद ही स्पष्ट होने लगा था। गौरतलब है कि इस सीट पर 15 वर्षों से लगातार राज्य की प्रभाशाली दल झारखंड मुक्ति मोर्चा का कब्जा रहा है। इस सीट की खास बात यह भी है कि राज्य बनने के बाद से लेकर आज तक यहां के मतदाताओं ने दलों को लगातार तीन बार मौका दिया है।
पिछली बार 2014 के चुनाव में जेएमएम के जगरनाथ महतो ने 77984 मतों के साथ बीजेपी के लाल चंद महतो को 32481 वोटों के अंतर से सिकस्त दिया था।
श्री महतो के सभी वर्ग से खाश लगाव और लोकप्रियता ने उन्हें इस सीट से पंद्रह वर्षों तक बांधे रखा।
लेकिन देश में चल रही राष्ट्रवाद का लाभ बीजेपी के उम्मीदवार पा सकने में सफल हो पाएंगे इसमें संदेह जान पड़ती है।
इसकी साफ वजह यहां के वोटरों के जातीय समीकरण हैं,जिसका पूरा असर ग्रामीण मतदाताओं में देखने को मिल जाता है।
करीब पौने तीन लाख मतदाताओं में से इकतालीस प्रतिशत ओबीसी के कुरमी या कुड मी हैं। जिनके वोट इस बार तीन हिस्से में बंट गए । जिनमें जेएमएम , बीजेपी और आजसू शामिल हैं।
अब बात करें ,अल्पसंख्यक और मुस्लिम वोटों की। जिनकी संख्या यहां लगभग 29 फीसदी है। इस बार उन्होंने महागठबंधन को तौबा कर दी। और असद्द उद्दीन ओवैसी की ए आई एम आई एम में यकीन पूरी मजबूती से कर पूरे योजना बद्ध तरीके से वोटों की बरसात अब्दुल मोबीन रिज़वी पर कर दी है।
अब मतदाताओं के संतुलन को तो नकारा नहीं ही जा सकता ।
हर तरफ से पकड़ा का भार कुछ और ही इशारा करता दिख रहा है ।अब बात करें अन्य प्रमुख दल आजसू की। तो आश्चर्यजनक तथ्य यहां की यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव में लोक सभा सीट की चाबी बीजेपी एलाइंस के उम्मीदवार को सौंप कर भी लोग उन्हें अभी तक दिल से स्वीकार नहीं कर सके हैं। अब इसकी वजह तो वे ही स्वयं बता सकते हैं। यदि कोई करामात नहीं हुई और इ वी एम से जिन्न नहीं निकला तो इस बार बारी अल्पसंख्यक की ही होगी। इसमें कोई संदेह नहीं ।

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