करमा’ शब्द कर्म (परिश्रम) तथा करम (भाग्य) को इंगित करता है। ‘मनुष्य नियमित रूप से अच्छे कर्म करे और भाग्य भी उसका साथ दे’, इसी कामना के साथ करम देवता की पूजा की जाती है। यह पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। सरगुजा अंचल में इस दिन बहनें अपने भाईयों की दीर्घायु के लिए दिन भर व्रत रखती हैं, तथा रात को करम देवता की पूजा के उपरांत प्रसाद ग्रहण कर व्रत तोड़ती हैं।
करमा पर्व में ‘करमी’ नामक वृक्ष की एक डाली को पारंपरिक रूप से गाँव के आँगन में गाड़कर स्थापित किया जाता है। उस डाली को ही करम देवता का प्रतीक माना जाता है और उसकी पूजा की जाती है। महिलायें करमा त्यौहार के सप्ताह भर पहले तीजा पर्व के दिन टोकरी में जौ/गेहुँ/मक्का बोती हैं जो करमा पर्व तक बढ़ गया होता है। स्थानीय बोली में उसे ‘जाईं’ कहा जाता है। उसी ‘जाईं’ में मिट्टी का दीया जलाते हैं उसे फूलों से सजाते हैं, और उसमें एक खीरा रखकर करम देवता के चरणों में चढ़ाते हैं। इसके बाद हाथ में अक्षत लेकर स्थानीय भाषा में करम देवता की कथा सुनते हैं ।


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